Saturday, June 2, 2012


कॅरियर के क्षेत्र में आज भले ही अनेक दरवाजे खुले हों, उनमें प्रवेश जारी हो फिर भी युवाओं का रुझान दो क्षेत्रों में अपना कॅरियर बनाने में सबसे ज्यादा रहता है, डॉक्टर और इंजीनियर यह ऐसा पेशा है, जो आज भी हर व्यवसाय पर पर भारी है। चिकित्सा क्षेत्र के प्रति बच्चों के बढ़ते आकर्षण का पहला कारण है विष्व में डॉक्टर होना नोबल प्रोफेशन माना जाता है। चिकित्सक ही है जिसने असाध्य रोगों पर विजय प्राप्त कर मृत्युदर को पीछे छोड़ दिया है और इंसानी जिंदगी को न केवल आसान बना दिया है, बल्कि उसे शतायु बनाने के प्रयास भी जारी हैं। डॉक्टर वह महापुरुष है, जिसके प्रति न केवल रोगी सम्मान प्रकट करते हैं बल्कि जब आपके परिवार का कोई सदस्य जिंदगी और मौत के साथ संघर्ष कर रहा होता है तो ईश्वर के बाद जिसके प्रति परिजनों की आस्था सर्वोपरि होती है।
अपनी सेवाओं तथा खोजों से चिकित्सकों ने जो सम्मान प्राप्त किया है, वह अन्य किसी व्यवसाय को हासिल नहीं । विष्व के ऐसे समृद्ध और शक्तिशाली इंसान जिनके सिर कभी किसी के सामने झुके नहीं, वे भी चिकित्सकों के समक्ष अपने या अपने परिजनों की जीवन सुरक्षा की खातिर नतमस्तक होते देखे जा सकते हैं।
भारतीय सभ्यता में प्राचीनकाल से ही सुगंध चिकित्सा का प्रचलन रहा है। इत्र, सुगंधित तेलों के प्रयोग और उत्पादन करने वाले उद्योग का विशेष स्थान है। आयुर्वेद में सुगंधित तेलों से शरीर की मालिश करने की विधि का प्रचलित है। इसके अलावा इत्र, धूप, अगरबत्ती जैसी वस्तुएँ भारतीय सभ्यता से बहुत लंबे समय से जुड़ी हैं। सुगंध चिकित्सा न सिर्फ इलाज, बल्कि रोजगार के रूप में व्यापक संभावनाओं भरे विकल्प के तौर पर विकसित हो रही हैं। प्राकृतिक चीजों के प्रति बढ़ते रुझान के कारण आज सेहत सुधार में भी सुगंध चिकित्सा का इस्तेमाल किया जाने लगा है।
प्रकृति के प्रति लगाव के कारण आज भारत के प्राकृतिक उत्पादों की माँग भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में देखने को मिल रही है। वर्तमान में स्थिति यह है कि विज्ञान के विकास से आज यह क्षेत्र विस्तृत हो गया है और एक उद्योग के रूप में स्थापित हो रहा है। भारत में सुगंध चिकित्सा के माध्यम से प्रकृति की ओर वापसी की धारणा को फिर से प्रचलित करने का श्रेय दिया जाए तो इस श्रंखला में शहनाज हुसैन, ब्लॉसम कोचर और भारती तनेजा जैसे नाम उभकर सामने आते हैं, जिन्होंने आम आदमी को ऐसे विकल्प दिए, जिनके चलते वह एक बार फिर से प्राकृतिक उत्पादों में विश्वास करने लगा है।
बाबा रामदेव योग की दुनिया का ऐसा नाम है जिसे बच्चा भी जानता है। बाबा रामदेव ने आयुर्वेद और योग दोनों से आम जनता को इस प्रकार जोड़ दिया है कि लोग स्वयं भी लाभ प्राप्त कर रहे हैं और दूसरों को भी प्रेरित कर रहे हैं। आज भारी संख्या में लोग अपनी बीमारियों का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा में खोज रहे हैं। आदमी की इसी बढ़ती रूचि के कारण प्राकृतिक चिकित्सा आज एक रोजगार विकल्प का रूप ले चुकी है।
प्राकृतिक चिकित्सा के लगातार बढ़ते प्रभाव के कारण आज देश के अनेक शिक्षण संस्थानों ने इस विद्या का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी शुरू कर दिया है। आज सरकारी, गैर सरकारी संस्थान भी प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े डिग्री, डिप्लोमा, सर्टिफिकेट कोर्स चला रहे हैं। इन संस्थानों में दाखिले की प्रक्रिया उसी तरह की होती है, जैसे कि अन्य व्यावसायिक या परंपरागत पाठ्यक्रम के लिए होती है।
डॉक्टरों का सेवाभाव, रहन-सहन, जीवनशैली, सामाजिक प्रतिष्ठा और इस पेशे से होने वाली आय कुछ ऐसे कारण हैं, जिनसे आकर्षित होकर छात्र सम्मानपूर्ण कॅरियर निर्माण की अवधारणा के चलते डॉक्टर बनने की चाहत रखते हैं। युवतियों में तो यह चाहत कुछ ज्यादा ही होती है, क्योंकि यह पेशा उनके लिए सबसे ज्यादा सुरक्षित और सम्मानपूर्ण है।
डॉक्टर के रूप में कॅरियर निर्माण का एक प्रमुख कारण यह भी है कि यह एक वैश्विक व्यवसाय है, जिसकी सारी दुनिया में माँग है। भारतीय चिकित्सकों के लिए केवल देश में ही नहीं विदेशों में भी एक से बढ़कर एक अवसर उपलब्ध हैं। भारत में कार्यरत चिकित्सक जहाँ मान और सम्मान पाता है, वहीं विदेशों में कार्यरत डॉक्टर असीम सुविधाओं का उपभोग करते हुए कॅरियर निर्माण की राह पर लगातार अग्रसर होते रहते हैं। इस व्यवसाय में रिटायरमेंट जैसी बात नहीं होती । अनुभव का प्रभाव परिपक्वता के साथ पेशे को स्वर्णिम बना देता है।
पिछले कुछ वर्षों से देखने में आया है कि युवाओं कि रुचि इस प्रकार के व्यवसाय में बढ़ रही है जिसमें 2-3 वर्ष की पढ़ाई के बाद ही रोजगार मिल जाए। जहॉं डॉक्टर बनकर तैयार होने का प्रष्न है तो इसमे पूरे दस वर्ष लग जाते हैं। जैसा धैर्य और स्नेह का पेशा है डॉक्टरी, वैसी ही उसकी पढ़ाई भी धैर्य और निष्ठा से परिपूर्ण है।
एक और कारण है, अन्य व्यवसायों की अपेक्षाकृत डॉक्टर से समाज को अनेक उम्मीद रहती हैं। मसलन उसका स्वभाव सरल हो, स्नेहपूर्ण व मिलनसार हो, कम बोले पर प्रेम से बोले, मरीज को समझे। पर ऐसा होता नहीं। अकसर देखने में आता है कि आम जनता की तकलीफों को दरकिनार करते हुए कुछ पेशेवर व्यवसायी मात्र अपनी पूर्तियों पर ध्यान देते हैं, जिससे जनता परेशान भी होती है और पेशा बदनाम होता है।
अभी तक का सबसे संवेदनशील विषय जिसके कारण डॉक्टरों के पेशे पर सर्वाधिक प्रश्नचिन्ह लगाए गए वह है - कन्या भ्रूण हत्या। एक अजन्में शिशु का गर्भ में वध!इस गंभीर विषय ने मातृत्व की वह कठिन परीक्षा ली जिसे पुरुष-प्रधान समाज स्वीकारने में भी संकोच करता है।
एक अन्य विषय पर विचार करें तो वह है प्रसव!
आज से करीब 20 वर्ष पहले मुड़कर देखें तो ऑपरेशन से प्रसव का प्रतिषत दो से पॉच हुआ करता था। आज परिस्थितियॉ ठीक उल्टी हैं, साधारण प्रसव का प्रतिशत 5 से 10 होता है। क्या व्यवसायीकरण की दौड़ में मॉं बनने के सुखद अनुभव पर प्रहार नहीं किया है?
इस डॉक्टर्स-डे पर इस बात पर गंभीरता से विचार की आवश्यकता है। कुछ मुद्रा प्रेमियों के चलते व्यवसाय बदनाम न हो ऐसा प्रयास करें। 
---योगेन्द्र सिंह तिहावली
                                                                                                                                       yogendratihawali@yahoo.com

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